27 साल बाद राष्ट्रपति का ऐतिहासिक कदम… क्या भारत-पुर्तगाल संबंधों में खुलेगा नया अध्याय?
नई दिल्ली/लिस्बन/ब्रातिस्लावा – 27 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद किसी भारतीय राष्ट्रपति ने पुर्तगाल की धरती पर कदम रखा है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की यह ऐतिहासिक राजकीय यात्रा केवल औपचारिक मुलाकातों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह भारत और यूरोपीय देशों—विशेषकर पुर्तगाल और स्लोवाकिया—के साथ द्विपक्षीय रिश्तों को नई गति देने की दिशा में एक मजबूत कूटनीतिक पहल बन गई है।
रविवार को राष्ट्रपति मुर्मू पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन पहुंचीं, जहां उनका भव्य स्वागत हुआ। इसके बाद सोमवार को उन्होंने पुर्तगाल के राष्ट्रपति मार्सेलो रेबेलो डी सूसा के साथ गहन और व्यापक बातचीत की।
राष्ट्रपति भवन की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी साझा की गई कि दोनों नेताओं के बीच भारत-पुर्तगाल संबंधों के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई, जिसमें वैश्विक और क्षेत्रीय हितों से जुड़े मुद्दे भी शामिल थे। दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि द्विपक्षीय संबंध आपसी विश्वास, समझ और सहयोग की बुनियाद पर खड़े हैं।
व्यापार, ऊर्जा और IT पर खास फोकस
बैठक में व्यापार और निवेश, सूचना प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा, और कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में सहयोग को और मजबूत करने पर विशेष बल दिया गया। यह बातचीत ऐसे समय में हो रही है जब भारत और पुर्तगाल के बीच राजनयिक संबंधों की पुनः स्थापना के 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं।
बीते कुछ वर्षों में भारत-पुर्तगाल संबंध ऐतिहासिक मित्रता से आगे बढ़कर एक आधुनिक और गतिशील साझेदारी में तब्दील हो चुके हैं। राष्ट्रपति मुर्मू की यात्रा इस बढ़ते हुए रिश्ते को न सिर्फ नई दिशा देगी बल्कि आगामी रणनीतिक साझेदारियों के लिए जमीन भी तैयार करेगी।
अगला पड़ाव: स्लोवाकिया, 29 साल बाद कोई भारतीय राष्ट्रपति पहुंचेगा
पुर्तगाल के बाद राष्ट्रपति मुर्मू स्लोवाकिया की ओर रुख करेंगी, जहां वे राष्ट्रपति पीटर पेलेग्रिनी और प्रधानमंत्री रॉबर्ट फिको से मुलाकात करेंगी। यह यात्रा और भी खास इसलिए है क्योंकि 29 वर्षों में पहली बार कोई भारतीय राष्ट्रपति स्लोवाकिया का दौरा कर रहा है।
स्लोवाकिया में होने वाली वार्ताओं से न सिर्फ भारत-स्लोवाकिया संबंधों को मजबूती मिलेगी, बल्कि यह भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच सहयोग को भी नया आयाम देने का अवसर बनेगा।
भारत की ‘डिप्लोमेसी विथ डिस्टिंक्शन’ रणनीति
राष्ट्रपति मुर्मू की यह दो देशों की राजकीय यात्रा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “डिप्लोमेसी विथ डिस्टिंक्शन” रणनीति के तहत भारत की विदेश नीति को और धार देने वाली मानी जा रही है।
भारत वैश्विक मंच पर जिस तेजी से अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है, ऐसे में यूरोप के साथ रणनीतिक साझेदारी न केवल आर्थिक बल्कि भूराजनीतिक दृष्टि से भी अहम है।
निष्कर्ष: क्या यह यात्रा बदल देगी भारत और यूरोप के समीकरण?
27 साल बाद पुर्तगाल और 29 साल बाद स्लोवाकिया की धरती पर भारतीय राष्ट्रपति की मौजूदगी सिर्फ औपचारिकता नहीं, एक बदलते भारत की अंतरराष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह यात्रा आने वाले वर्षों में भारत और यूरोपीय देशों के संबंधों को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकेगी।
आगामी बैठकों और समझौतों पर दुनिया की नजरें टिकी हैं—क्या यह केवल एक ऐतिहासिक यात्रा भर है या एक नए युग की शुरुआत?
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