हुर्रियत प्रमुख मीरवाइज उमर फारूक ने वक्फ विधेयक और शराब नीति पर उठाए गंभीर सवाल, कर्मचारियों की बर्खास्तगी को बताया निंदनीय
हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के प्रमुख मीरवाइज उमर फारूक ने एक बार फिर वक्फ विधेयक पर सवाल उठाते हुए इसे मुसलमानों की चिंताओं को नजरअंदाज करने वाला बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस विधेयक के तहत मुस्लिम समुदाय की धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं की स्वायत्तता को खत्म किया जा रहा है, जो किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। उनका कहना है कि इस विधेयक को बिना सही तरीके से मुस्लिम समुदाय की राय लिए पारित किया जा रहा है, जो भविष्य में धार्मिक स्वतंत्रता को भी खतरे में डाल सकता है।
वहीं, मीरवाइज उमर फारूक ने जम्मू-कश्मीर में शराब के उपयोग को लेकर नेशनल कॉन्फ्रेंस के हालिया बयान की भी कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा कि यह बयान बेहद गैर जिम्मेदार है और राज्य की सामाजिक और धार्मिक धारा को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि जम्मू-कश्मीर हमेशा से मुस्लिम बहुल राज्य रहा है और यहां की संस्कृति, परंपरा और तहजीब को सही दिशा में बनाए रखना जरूरी है। उमर फारूक का कहना है कि यदि नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता यह मानते हैं कि जम्मू-कश्मीर को एक टूरिस्ट स्थल की तरह ढाल दिया जाए, तो यह न केवल गलत है, बल्कि समाज की मूलभूत पहचान से खिलवाड़ करना भी है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शराब के उपयोग से राज्य की धार्मिक और सांस्कृतिक धारा प्रभावित होगी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि भारत के कई राज्य ऐसे हैं, जहां शराब पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया गया है, और उन्हीं मॉडलों को जम्मू-कश्मीर में भी अपनाया जाना चाहिए। फारूक का कहना था कि अगर राज्य को राजस्व की आवश्यकता है, तो शराब जैसे तत्वों का सहारा लेना गलत है। उनका कहना था, “अगर हम राज्य के लोगों को फायदा नहीं दे सकते, तो कम से कम उनका नुकसान तो न करें। हमें अपनी संस्कृति को बचाने की आवश्यकता है।”
इसके अलावा, मीरवाइज ने जम्मू-कश्मीर में राज्य कर्मचारियों को तानाशाही तरीके से बर्खास्त किए जाने पर भी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या शासक धीरे-धीरे सभी कश्मीरियों को सरकारी सेवाओं से हटा कर बेरोजगार बनाना चाहते हैं? मीरवाइज फारूक ने इसे एक गंभीर उत्पीड़न करार देते हुए कहा कि यह निर्वाचित प्रतिनिधियों का कर्तव्य है कि वे इस मुद्दे को तुरंत संबंधित अधिकारियों के सामने उठाएं और इस तरह के उत्पीड़न को रोकें।
उन्होंने इस्लामिक साहित्य पर भी प्रतिबंध लगाने की आलोचना की और इसे पूरी तरह से गलत बताया। उनका कहना था कि यह कदम केवल कश्मीर की संस्कृति को नुकसान पहुंचाएगा और लोगों को उनके धार्मिक अधिकारों से वंचित करेगा।
मीरवाइज उमर फारूक के इन बयानों ने राज्य की वर्तमान राजनीति और सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, और यह उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में यह मुद्दे अधिक चर्चा में रहेंगे।
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