क्या ‘छावा’ की शेर जैसी कहानी में हैं ये कमजोर कड़ी? जानिए फिल्म के वो पहलू जो निराश कर सकते हैं
फिल्म “छावा” भारतीय इतिहास के महान और बहादुर योद्धा, छत्रपति संभाजी महाराज के जीवन पर आधारित है। इस फिल्म में दर्शकों को संभाजी महाराज के संघर्ष, बलिदान और उनके पिता छत्रपति शिवाजी महाराज के सपने को पूरा करने की कहानी दिखाई जाएगी। विकी कौशल और लक्ष्मण उतेकर की मेहनत से सजी इस फिल्म को लेकर लोगों में उत्साह है, लेकिन क्या यह फिल्म उन उम्मीदों पर खरी उतरती है? क्या छावा की ये कहानी हर दिल को छू सकती है?
जब हम इस फिल्म को बड़े पर्दे पर देखेंगे, तो न केवल छत्रपति संभाजी महाराज के जीवन के संघर्ष की कहानी को महसूस करेंगे, बल्कि इसके साथ ही हम यह भी देखेंगे कि इस फिल्म में कुछ ऐसे पहलू भी हैं जो आपको निराश कर सकते हैं। यहाँ हम आपको फिल्म “छावा” से जुड़ी पांच कमजोर कड़ियों के बारे में बताएंगे, जिनकी वजह से यह फिल्म पूर्ण रूप से हर दर्शक वर्ग के लिए प्रभावशाली नहीं बन पाई।
1. रश्मिका मंदाना का किरदार – येसूबाई का दक्षिणी एक्सेंट
रश्मिका मंदाना को फिल्म “छावा” में छत्रपति संभाजी महाराज की पत्नी येसूबाई के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि रश्मिका एक बहुत ही प्रतिभाशाली अभिनेत्री हैं, लेकिन जब हम उनके द्वारा निभाए गए येसूबाई के किरदार को देखते हैं, तो एक चीज साफ नजर आती है। रश्मिका की हिंदी में दक्षिणी एक्सेंट दिखाई देती है। चूंकि फिल्म हिंदी है और किरदार मराठी में है, इसलिए इस एक्सेंट का फिल्म की भावनाओं पर असर पड़ा है। खासकर प्रियंका चोपड़ा की “काशीबाई” और कृति सेनन की “पार्वती बाई” जैसे किरदारों के बाद, रश्मिका की येसूबाई हमें सही मायनों में प्रेरित नहीं करती।
2. एआर रहमान का म्यूजिक – क्या खो गया है वो खास जादू?
एआर रहमान, जिनके संगीत की हर कोई सराहना करता है और जिनका संगीत ऑस्कर जैसे प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा जा चुका है, इस फिल्म के संगीत में वह बात नहीं नजर आती। फिल्म के संगीत में वो फोक स्टाइल की कमी महसूस होती है, जो हमें अन्य एतिहासिक फिल्मों में दिखती है। हालांकि, ‘औरंगजेब’ के लिए रहमान का संगीत बेहतरीन था, लेकिन इस फिल्म में उनका संगीत उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता। निर्देशक लक्ष्मण उतेकर ने तमिल संगीतकार को इस फिल्म के लिए क्यों चुना, यह बड़ा सवाल बनकर सामने आता है।
3. फिल्म के गाने – कोई गाना नहीं है जो दिल में बस जाए
एक ऐतिहासिक फिल्म में अच्छे गाने फिल्म के प्रभाव को दोगुना कर सकते हैं, लेकिन “छावा” में ऐसा कोई गाना नहीं है जिसे हम बार-बार सुनना चाहें। बॉलीवुड की ऐसी फिल्मों में अक्सर एक डिवोशनल गाना होता है जो दर्शकों को रिवर्स में खींचता है, जैसे “तान्हाजी” में ‘शंकरा’ या “बाजीराव मस्तानी” में ‘गजानना’ था। लेकिन “छावा” में ऐसा कोई गाना नहीं है जो दर्शकों के दिल में जगह बना सके। यह फिल्म इस मामले में निराश करती है।
4. फिल्म का फर्स्ट हाफ – धीमी गति से कहानी की शुरुआत
फिल्म का पहला भाग थोड़ा स्लो है और कहानी को समझने में समय लगता है। यह महसूस होता है कि निर्देशक ने शायद इस बात का ध्यान रखा है कि छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके परिवार के अन्य सदस्य गलत तरीके से प्रस्तुत न हो जाएं। शायद इसी कारण उन्होंने अपने विजन से समझौता किया है और इस बात का ख्याल रखा है कि फिल्म में कुछ हिस्सों को ज्यादा विस्तार न दिया जाए। परिणामस्वरूप, फर्स्ट हाफ की गति धीमी है और यह कुछ दर्शकों को निराश कर सकता है।
5. डायना पेंटी का अभिनय – कब कमजोर पड़ जाती हैं?
एक्ट्रेस डायना पेंटी ने इस फिल्म में अकबर की बेटी का किरदार निभाया है, और उनके अभिनय को सराहा भी गया है। हालांकि, जब वह अक्षय खन्ना और विकी कौशल जैसे सितारों के साथ स्क्रीन शेयर करती हैं, तो उनका प्रदर्शन उनके सामने कमजोर पड़ जाता है। उनके साथ स्क्रीन पर मौजूद अन्य कलाकारों की छाया उनके अभिनय को कहीं न कहीं ढक देती है, और उनकी मौजूदगी उतनी प्रभावशाली नहीं बन पाती।
क्या छावा की शेर जैसी कहानी इन कमजोरियों से उबर पाएगी?
हालांकि फिल्म “छावा” में कई सकारात्मक पहलू हैं और इसकी कहानी का मजबूत आधार है, लेकिन इन कमजोरियों की वजह से फिल्म में कुछ हद तक कमी महसूस होती है। दर्शकों को इन पहलुओं से निराशा हो सकती है, और खासकर उन लोगों को जो एक ऐतिहासिक फिल्म में हर पहलू को परफेक्ट देखना चाहते हैं।
फिल्म में छत्रपति संभाजी महाराज के त्याग और बलिदान को शानदार तरीके से प्रस्तुत किया गया है, लेकिन क्या ये कमजोर कड़ियाँ फिल्म के समग्र प्रभाव को कमजोर करती हैं? यह देखना दिलचस्प होगा कि फिल्म के अंतिम परिणाम के तौर पर दर्शक इसे कैसे लेते हैं।
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