May 2, 2026

कव्वाली के सुरों से चमका सितारा, जिसने हिंदी सिनेमा को दिए संगीत के अनमोल रत्न: ऋतिक रोशन के दादा रोशन लाल नागरथ की कहानी

14 जुलाई को जब बॉलीवुड में संगीत प्रेमी ऋतिक रोशन के दादा रोशन लाल नागरथ की 107वीं जयंती मना रहे हैं, तो उनके जीवन और संगीत की वो दास्तान एक बार फिर सबके ज़ेहन में ताज़ा हो गई है। क्या आपको पता है कि उन्हें ‘कव्वाली के बादशाह’ क्यों कहा जाता है? और किसने उनके बचपन को संगीत से जोड़ा?

बॉलीवुड की चमचमाती दुनिया में आज अगर ऋतिक रोशन का नाम शीर्ष पर है, तो इसके पीछे तीन पीढ़ियों की मेहनत और संगीत से जुड़ा एक गहरा रिश्ता है। ऋतिक के दादा रोशन लाल नागरथ का जन्म 14 जुलाई 1917 को ब्रिटिश इंडिया के गुजरांवाला (अब पाकिस्तान में) हुआ था। उन्होंने ऐसे दौर में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा, जब संगीत न केवल फिल्मों की जान हुआ करता था, बल्कि यह उस दौर की आत्मा भी था।

रोशन लाल बचपन से ही संगीत के प्रति बेहद संवेदनशील और समर्पित थे। उनकी पहली संगीत शिक्षा मशहूर सरोद वादक अलाउद्दीन खान से हुई, जिन्होंने उन्हें शास्त्रीय संगीत की बारीकियों में पारंगत किया। यहीं से रोशन के भीतर संगीत की गहराई बसने लगी। 1940 में ख्वाजा खुर्शीद अनवर ने उन्हें ऑल इंडिया रेडियो में नौकरी दिलाई, जिससे उनका करियर शुरू हुआ। लेकिन 8 साल बाद उन्होंने रेडियो की स्थिरता को छोड़कर फिल्मी दुनिया का जोखिम भरा रास्ता चुना।

करीब दो साल तक संघर्ष के बाद आखिरकार उन्हें एक बड़ा मौका मिला, जब वो मोहम्मद रफी और तलत महमूद जैसे दिग्गज गायकों के साथ काम करने लगे। उनका पहला सुपरहिट गाना था – “ऐरी मैं तो प्रेम दीवानी, मेरा दर्द ना जाने कोई” – जिसे स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने अपनी आवाज़ दी थी और यह फिल्म नौबहार (1952) का हिस्सा था। इसके बाद उनका संगीत सफर कभी नहीं रुका।

रोशन लाल की पहचान बन गई उनके द्वारा रची गई कव्वालियां, जिनमें सूफियाना रंग और गहराई का अद्भुत मेल देखने को मिलता था। यही वजह है कि उन्हें ‘कव्वाली का बादशाह’ कहा जाने लगा। 1956 में फिल्म भला आदमी से उन्होंने बतौर म्यूजिक डायरेक्टर अपनी जगह मजबूत कर ली। उन्होंने गीतकार आनंद बख्शी के साथ मिलकर कई ऐसे गाने बनाए जो आज भी कालजयी माने जाते हैं।

रोशन लाल नागरथ ने ईरा मोइत्रा से विवाह किया, जिनसे उन्हें दो बेटे हुए – राकेश रोशन और राजेश रोशन। आगे चलकर राकेश रोशन अभिनेता और फिल्म निर्देशक बने, जबकि राजेश रोशन ने अपने पिता की संगीत परंपरा को आगे बढ़ाया। वहीं उनके पोते ऋतिक रोशन ने बतौर अभिनेता फिल्म कहो ना प्यार है (2000) से अपने करियर की धमाकेदार शुरुआत की और बॉलीवुड में एक नई पीढ़ी को रोशन नाम से परिचित कराया।

हालांकि संगीत का यह चमकता सितारा ज़्यादा लंबे वक्त तक जिंदा नहीं रहा। लगभग 20 साल हार्ट की बीमारी से जूझने के बाद, 16 नवंबर 1967 को केवल 50 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। लेकिन आज भी उनकी बनाई धुनें और उनकी कव्वालियों की मिठास श्रोताओं के दिलों में ज़िंदा है।

उनकी ज़िंदगी और संगीत यात्रा पर आधारित ‘The Roshans’ नामक डॉक्यूमेंट्री नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध है, जिसमें उनके परिवार और करियर से जुड़ी कई रोचक जानकारियां साझा की गई हैं।

रोशन लाल नागरथ का संगीत सिर्फ धुन नहीं था, वो एक दौर का हिस्सा था – जब गीतों में आत्मा बसती थी और कव्वालियों से ज़माना झूम उठता था।

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