पश्चिमी यूपी में RLD की बढ़ती सक्रियता से बीजेपी में हलचल, सीटों के बंटवारे को लेकर गठबंधन में खींचतान तेज
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समय राष्ट्रीय लोकदल (RLD) की बढ़ती सक्रियता से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के अंदर हलचल मच गई है। जयंत चौधरी के नेतृत्व में RLD ने पंचायत चुनावों में अकेले उतरने का संकेत देकर एनडीए के भीतर सियासी समीकरणों को चुनौती दे दी है। पार्टी की यह रणनीति न केवल पंचायत चुनावों तक सीमित है, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनावों में भी RLD अपनी पुरानी ताकत वाले क्षेत्रों में फिर से प्रभाव जमाने की तैयारी कर रही है।
RLD फिलहाल केंद्र और उत्तर प्रदेश दोनों ही स्तरों पर एनडीए का हिस्सा है। जयंत चौधरी केंद्र सरकार में मंत्री हैं और अनिल कुमार उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। लेकिन पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रामाशीष राय द्वारा आगामी पंचायत चुनावों के लिए छह सदस्यीय समिति बनाना और मंडल स्तर पर सम्मेलन शुरू करने की योजना ने इस गठबंधन में तनाव को बढ़ा दिया है। यह सम्मेलन सितंबर से पश्चिमी यूपी से शुरू होने की उम्मीद है।
राज्य के मथुरा, आगरा, अलीगढ़, हाथरस, शामली, बागपत, मेरठ, मुजफ्फरनगर और बिजनौर जैसे जिले RLD के विशेष फोकस में हैं। जिन सीटों पर RLD पहले प्रभावशाली रही है, वहां पार्टी अपनी जमीनी पकड़ को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही है। सादाबाद, छाता, मांट और फतेहपुर सीकरी जैसी सीटों पर पार्टी के नेताओं की सक्रियता ने बीजेपी विधायकों को चिंतित कर दिया है। खासकर तब, जब कुछ बीजेपी विधायक खुद कभी RLD से जुड़े रहे हैं, जिससे उनके दोबारा पाला बदलने की अटकलें भी तेज हो गई हैं।
बीजेपी के भीतर भी इस बढ़ती सक्रियता को लेकर असंतोष सामने आने लगा है। योगी सरकार में मंत्री चौधरी लक्ष्मीनारायण ने RLD पर तीखा बयान दिया, जिससे गठबंधन की सियासत और गरमा गई। हालांकि बीजेपी नेतृत्व ने इसे उनकी निजी राय बताया, लेकिन इस बयान को अन्य असंतुष्ट विधायकों का समर्थन भी मिला है। मांट से विधायक राजेश चौधरी ने भी मुख्यमंत्री से RLD नेताओं की गतिविधियों को लेकर शिकायत की है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि RLD का जाट और किसान वोट बैंक पश्चिमी यूपी में उसकी बड़ी ताकत है, वहीं बीजेपी के पास मजबूत संगठनात्मक नेटवर्क और सरकार की योजनाओं का सहारा है। अब देखना यह है कि सीटों के बंटवारे और पंचायत चुनावों में कौन सा दल कितना प्रभाव दिखा पाता है। फिलहाल इतना तय है कि गठबंधन की नाव फिलहाल राजनीतिक तूफानों से गुजर रही है, और यह देखना दिलचस्प होगा कि जयंत चौधरी का “हैंडपंप” बीजेपी की “संगठन शक्ति” के सामने कितना पानी खींच पाता है।
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